इस आदेश के बाद अब निकायों की बैठकों में ‘पार्षद पति’ या ‘रिश्तेदार’ अपनी धौंस नहीं जमा पाएंगे। अब फाइलों पर हस्ताक्षर से लेकर बैठकों में निर्णय लेने तक, निर्वाचित महिला को ही सामने आना होगा। शासन ने स्पष्ट कर दिया है कि निकायों के कामकाज में बाहरी हस्तक्षेप कतई बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

छत्तीसगढ़ के नगरीय निकायों में महिला जनप्रतिनिधियों के नाम पर उनके पति, भाई या रिश्तेदारों द्वारा सत्ता चलाने के दौर पर अब कानूनी हंटर चलने वाला है। छत्तीसगढ़ शासन के नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग ने एक बेहद सख्त आदेश जारी करते हुए महिला पार्षदों और जनप्रतिनिधियों के रिश्तेदारों को ‘प्रॉक्सी प्रतिनिधि’ या ‘लायजन पर्सन’ नियुक्त करने पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी है। संविधान और मानवाधिकारों का हवाला विभाग द्वारा जारी पत्र (File No.: VIGI-2904/2/2025-UAD) में स्पष्ट किया गया है कि निर्वाचित महिला प्रतिनिधियों के कामकाज में उनके रिश्तेदारों का हस्तक्षेप न केवल प्रशासनिक नियमों का उल्लंघन है, बल्कि यह भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14, 15(3) और 21 का भी सीधा उल्लंघन है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने इस मुद्दे को गंभीरता से लेते हुए इसे महिलाओं के संवैधानिक अधिकारों का हनन माना है। इस आदेश की सबसे धारदार बात यह है कि इसमें केवल विभागीय कार्रवाई की चेतावनी नहीं दी गई है, बल्कि कानूनी कार्रवाई का भी उल्लेख है। आदेश में साफ कहा गया है कि उल्लंघन की स्थिति में:भारतीय न्याय संहिता 2023 की धारा 207, 223 और 316 के तहत कार्रवाई की जा सकती है।मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम 1993 की धारा 13 के अंतर्गत भी कड़े कदम उठाए जा सकते हैं।

सांसदों और विधायकों को भी निर्देश …… अक्सर देखा जाता है कि सांसद और विधायक अपने कोटे से नगरीय निकायों में प्रतिनिधि नियुक्त करते हैं। शासन ने अब सभी आयुक्तों और मुख्य नगर पालिका अधिकारियों को निर्देशित किया है कि वे सांसदों और विधायकों को अवगत कराएं कि वे किसी भी महिला जनप्रतिनिधि के पारिवारिक रिश्तेदार को अपना प्रतिनिधि नियुक्त न करें।




