फिल्म “बंगाल 1947” में छत्तीसगढ़ बंगाली मित्र समाज के प्रदेशाध्यक्ष सुमन शील पंडित के सहायक भूमिका में होने के अलावा छत्तीसगढ़ के विभिन्न कलाकारों सहित रायगढ़ के डॉक्टर योगेंद्र चौबे ने निभाया प्रमुख भूमिका ।

बंगाल 1947′ (Bengal 1947) नाम की फिल्म छत्तीसगढ़ के खैरागढ़, गंडई और उत्तर बस्तर जैसे इलाकों में बनी है और इसे राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल्स (जैसे बंगाल फिल्म फेस्टिवल) में सराहा गया है, जहाँ इसके ऐतिहासिक विषय और निर्देशक आकाशआदित्य लामा की प्रतिभा पर ध्यान दिया गया है। यह फिल्म विभाजन के दौर की घटनाओं के साथ समाज के कुरीतियों को दर्शाती है और फेस्टिवल सर्किट में अच्छा प्रदर्शन कर रही है। वर्तमान में प्रारंभ हुई 13 नवम्बर से उत्तरप्रदेश आगरा जे पी सभागार खंदारी परिसर में हो रही सेवन ग्लोबल ताज इंटरनैशनल फिल्म फेस्टिवल के उद्घाटन सत्र और ओपनिंग में फिल्म में ” बंगाल 1947″ का चयन किया गया।

“Bengal 1947″– एक दिल दहला देने वाली उत्कृष्ट फिल्म है। जो देखने के बाद लंबे समय तक मन में बस जाती है। यह सिर्फ इतिहास का पुनर्कथन नहीं, बल्कि भावनाओं, पीड़ा, संघर्ष और उम्मीद से बुनी एक गहरी मानवीय कहानी है।फिल्म की सबसे बड़ी ताकत इसका निस्पक्ष और संवेदनशील प्रस्तुतीकरण है। निर्देशक ने बंटवारे की आग में झुलसते बंगाल की हालत को जिस सूक्ष्मता और ईमानदारी से पेश किया है, वह गहरे असर छोड़ता है। बारीकी से रिसर्च की गई कहानी, वास्तविक घटनाओं पर आधारित और बेहद पकड़ रखने वाली। हर कलाकार ने अपने किरदार में सच्चाई भर दी है।

कुछ दृश्यों में कलाकारों का दर्द स्क्रीन से बाहर तक महसूस होता है।सिनेमाटोग्राफी बेहद खूबसूरत—हर फ्रेम इतिहास की एक जीवंत तस्वीर की तरह।संगीत ने दुख, भय, और उम्मीद—हर भाव को सही जगह छुआ है।डायलॉग्स सीधे दिल तक उतरने वाले, कुछ तो याद रह जाने वाले फिल्म का हर एंगल ध्यान खींचता है—चाहे वो सेट डिज़ाइन हो, वेशभूषा, ऐतिहासिक माहौल या दृश्य-निर्माण की बारीकियां।

फिल्म न सिर्फ़ मनोरंजन करती है, बल्कि उस दौर की सच्चाई को समझने का एक मौका भी देती है। Bengal 1947 एक ऐसी फिल्म है जिसे सिर्फ देखा नहीं जाता—महसूस किया जाता है। इतिहास, इंसानियत और सिनेमा—तीनों का अनोखा संगम। पूरी तरह लाजवाब, हर एंगल से बेहतरीन।

